इंदिरा गांधी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल में निशुल्क इलाज योजना के तहत सुविधाएं तो बढ़ी, लेकिन इनके साथ-साथ मरीजों की संख्या में इतना इजाफा होने से अब यह परेशानी बन रही है।
सौ बेड के इस अस्पताल में अक्सर 180 से 200 मरीजों की संख्या रहती है। ऐसे में मरीजों के साथ-साथ तिमारदारों को भी फर्श पर बैठना पड़ता है।
अब न केवल स्टॉफ, बल्कि मरीज भी बेडों की संख्या बढ़ानेे की मांग कर रहे हैं। कैथल सहित आसपास के क्षेत्र में बड़ा अस्पताल न होने के कारण अस्पताल में 100 बेड की सुविधा है। लेकिन यहां अक्सर 180 से 200 मरीजों की संख्या रहती है। सबसे दयनीय हालत तो महिला वार्ड की है। जहां कई बार तो एक बेड पर तीन-तीन मरीजों को दाखिल करना पड़ता है। यहां प्रसूति के लिए आने वाली महिलाओं की संख्या बेड़ों की संख्या से दोगुना होती है।
ऐसे होती है परेशानी
अस्पताल में 100 बेडों में से प्रसूति से पहले के वार्ड में 12 बेड हैं। लेकिन यहां अक्सर मरीजों की संख्या ज्यादा हो जाती है। इसी प्रकार से प्रसूति के बाद महिलाओं को रखने वाले वार्ड में 24 बेडों पर अक्सर दो-दो महिलाओं को रखना पड़ता है। यही स्थिति महिलाओं के लिए ऑपरेशन के बाद रखे जाने वाले मरीजों के वार्ड में रहती है। यहां 28 बेड हैं। लेकिन अक्सर यहां 70-70 मरीज दाखिल रहते हैं। इसके अलावा सामान्य वार्डों में कुल 46 बेड हैं। जहां कभी कभार ही मरीजों की संख्या 80 से नीचे रहती है। स्टॉफ सदस्यों का कहना है कि मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा है कि यहां बेड कम होने पर उन्हें लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ता है।
‘बैठने के लिए भी नहीं मिलती जगह’
मरीजों के साथ आई सौंगल निवासी रोशनी देवी ने कहा कि अस्पताल में बैठने तक की जगह नहीं बचती है। उन्हें नीचे बैठकर यहां समय काटना पड़ रहा है। वहीं प्यौदा निवासी शांति देवी ने कहा कि उनकी बहू को ऑपरेशन से बच्चा हुआ है। यहां सोने तक की जगह नहीं मिलती। उन्हें नीचे बैठना पड़ता है। वहीं मरीजों को भी कई बार एक बैड पर दो-दो की संख्या में कर दिया जाता है। सौंगल निवासी राममेहर ने कहा कि बैठक कम होने की स्थिति में एक ही बेड पर कई मरीज हो जाते हैं। जिस कारण इन्फेकशन फैलने का भी खतरा बना रहता है।