अभी तक लेपर्ड और टाइगर ही खाल, हड्डियों के लिए शिकारियों की भेंट चढ़ते रहे हैं, लेकिन अब जंगली बिल्लियां भी महफूज नहीं। शिकारी खाल के लिए इन्हें भी शिकार बना रहे हैं।
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इनसे बने कोट की सर्वाधिक मांग हैं। खाल कौन सी प्रजाति की बिल्ली की है, यह जानने के लिए भारतीय जंतु सर्वेक्षण (जेडएसआई) ने पहली बार माइटोकांड्रियल सीक्वेंसिंग (क्रम निर्धारण) शुरू की है, जिससे कोर्ट में मदद मिल सके।
इससे यह पता चल सकेगा कि पकड़ी गई बिल्ली की खाल संरक्षित प्रजाति की तो नहीं? यह सजा तय करने में भी मदद करेगा।
इस तरह के तकरीबन 6 मामले इसी साल कोलकाता के पास आ चुके हैं, जिसमें पहचान करने की जरूरत पड़ी। कोट बिल्ली की खाल के थे, यह तो तय हुआ, लेकिन इसकी प्रजाति और मूल का पता नहीं चल पाया।
इस काम में अब सीक्वेंसिंग मदद करेगी। इसके लिए जेडएसआई के कोलकाता स्थित म्यूजियम से बिल्लियों के दशकों पुरानी खालों के सैंपल लाए गए हैं।
लोअर रिस्क से हाई रिस्क की ओर
कई प्रजातियों की बिल्लियों के भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित होने की वजह से जीवित बिल्लियों से सैंपल हासिल नहीं किया जा सकता।
भारतीय जंतु सर्वेक्षण (जेडएसआई) की प्रमुख जांचकर्ता डॉ. अर्चना बहुगुणा के मुताबिक माइटोकांड्रियल सीक्वेंसिंग का यह महत्वपूर्ण कार्य 2016 तक पूरा हो सकेगा।
इन 8 प्रजातियों की हो रही सीक्वेंसिंग
गोल्डन कैट, मारबल्ड कैट, डेजर्ट कैट, जंगल कैट, कारसल कैट, लेपर्ड कैट, स्पाटेड कैट, फिशिंग कैट
लोअर रिस्क से हाई रिस्क की ओर
अभी तक जंगली बिल्लियां लोअर रिस्क कैटेगरी में हैं, लेकिन धीरे-धीरे हाई रिस्क कैटेगरी की तरफ बढ़ रही हैं। उत्तराखंड में रोड किलिंग भी मुसीबत है। पहाड़ों में सड़क बनाने के दौरान जंगली बिल्लियां अपनी शरणस्थली खो रही हैं।
क्या है माइटोकांड्रियल सीक्वेंसिंग
माइटोकांड्रिया में जींस होते हैं। हर जीन का सीक्वेंस अलग होता है, जो प्रजाति की पहचान कराता है। जैसे साइटोक्रोम बी या अन्य जींस।