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उत्तराखंडः स्पीकर ने दिया भाजपा को झटका, भीमलाल की सदस्यता बरकरार

ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 03 May 2016 03:10 AM IST

सार

  • विधानसभा अध्यक्ष ने दल बदल कानून के तहत दी गई भाजपा की याचिका को किया खारिज
  • भाजपा के निलंबित विधायक हैं भीमलाल आर्य
  • बागियों की सदस्यता समाप्त होने के बाद भाजपा ने दी थी याचिका
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गोविंद कुंजवाल - फोटो : file photo
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विस्तार
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भाजपा के निलंबित विधायक भीमलाल आर्य की विधानसभा सदस्यता बरकरार रहेगी। सोमवार को विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने भाजपा के मुख्य सचेतक मदन कौशिक की याचिका को खारिज कर दिया। कौशिक ने व्हिप के उल्लंघन का मामला बनाते हुए दल बदल कानून के तहत भीमलाल की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए याचिका दी थी।
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हरीश रावत की सरकार के खिलाफ जाने वाले नौ कांग्रेसी विधायकों की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने के बाद ही भाजपा ने भी घनसाली विधायक भीमलाल के खिलाफ दल बदल कानून के तहत याचिका दी थी।

भाजपा के मुख्य सचेतक मदन कौशिक की ओर से याचिका में मुख्य रूप से दो मामले भीमलाल के खिलाफ उठाए गए थे। जिसमें छह मार्च को तीन लाइन का व्हिप जारी किया गया था। कहा गया कि घनसाली विधायक भीमलाल आर्य ने इस व्हिप को नहीं माना।
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भीमलाल का जवाब, 'मुझे पार्टी बैठकों में नहीं बुलाया जाता था'

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट‍ - फोटो : अमर उजाला
18 मार्च को भाजपा विधानमंडल दल ने वित्त विनियोग विधेयक पर मत विभाजन की मांग का निर्णय लिया था। कहा गया कि भीमलाल इसमें भी शामिल नहीं हुए और सदन में नहीं आए।

याचिका में यह भी कहा गया कि भीमलाल ने कांग्रेस का साथ देने की एवज में उस समय सरकार की ओर से दिए गए डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती समारोह समिति के उपाध्यक्ष (राज्यमंत्री) पद को भी स्वीकार किया।

जवाब में भीमलाल आर्य ने साफ कहा कि उन्हें पांच मई 2015 को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद से ही पार्टी की बैठकों, विधानमंडल दल की बैठकों में उन्हें नहीं बुलाया जाता था।

उपाध्यक्ष बनाए जाने का तर्क पीठ ने किया खारिज

गोविंद सिंह कुंजवाल - फोटो : file photo
भीमलाल ने छह मार्च को जारी व्हिप के नहीं मिलने का दावा किया। विधानसभा अध्यक्ष की ओर से दिए गए फैसले में कहा गया कि मुख्य सचेतक की ओर से भीमलाल को कोई व्हिप उपलब्ध कराया ही नहीं गया।

अंबेडकर जयंती समारोह समिति में उपाध्यक्ष बनाए जाने के मामले पर भी पीठ ने विचार किया। पीठ ने भी माना कि समिति में उपाध्यक्ष बनाए जाने मात्र से दल बदल कानून के तहत सदस्यता को समाप्त करने का आधार नहीं बनता।
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