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उपन्यास 'शांताराम'

Updated Sat, 12 Jul 2014 11:46 PM IST
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इस उपन्यास का शीर्षक है 'शांताराम'। लेकिन वह सारे कथानक में गैरहाजिर है। अंत तक पाठक पूछता है, शांताराम कौन था? कहां था? उनका क्या हुआ? ऑस्ट्रेलिया मूल के लेखक ग्रेगोरी डेविड राबर्ट्स ने मुंबई में बदनाम अपराधियों के बीच रहकर, बल्कि उनका हिस्सा बनकर उनके यथार्थ को भोगा और यह रचना रची। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में जेल भी काटी, बाहर निकलकर एक मीडिया कंपनी बनाई और फिर लेखन को समर्पित हो गए। इस उपन्यास की तुलना अरेबियन नाइट्स तक से की गई है।
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'शांताराम' के नायक का नाम लिन है, न्यूजीलैंड से भारत में पर्यटक के रूप में आया नायक, जो वीजा की मियाद होने के बावजूद मुंबई में ही रह गया, अपराधियों के साथ एक अपराधी की तरह। कुछ ऐसे ही जैसे कि ब्रिटिश उपन्यासकार जैफरी आर्चर ने जेल में रहकर वहां के जीवन पर कहानी लिखी। 'शांताराम' का नायक जुआ खेलता है, अफीम, गांजे, देशी शराब का धंधा करता है। उसकी एक प्रेमिका है कार्ला। वह अपना अलग जीवन जीती है पर उससे बहुत प्यार करती है। लिन को अपने घृणित जीवन पर पछतावा है, पर वह उसमें इतना गहरा पैठ गया है कि कभी बाहर आ नही पाया।

इस उपन्यास का न कोई आदि है न अंत। कोई क्लाइमैक्स भी नहीं। कहानी ऐसे गुजरती है जैसे जीवन। पाठक अक्सर पूछता है- फिर क्या हुआ? पर कुछ नहीं होता है। मुंबई के जीवन पर अनेक उपन्यास लिखे गए हैं, जैसे कि 'बंबई दिनांक', पर 'शांताराम' जैसा एक भी नहीं। वह भी एक विदेशी की निगाहों से, उसकी कलम से। यह अपराधी अपराध के प्रति घृणा पैदा नहीं करता, अपितु उसे मानवीय दृष्टि से देखने का आग्रह करता है।
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मुंबई जो दो कारणों से जाना जाता है-बॉलीवुड और गरीबी, दोनों की इस उपन्यास में भरमार है। ग्रेगोरी इसकी दूसरी कड़ी लिख रहे हैं 'द माउंटेन शैडो' (पहाड़ की छाया)। उपन्यास का एक अंश देखिए 'मैं सोचता हूं कि हम सभी को अपना भविष्य अर्जित करना पड़ता है। वह धीरे से बोली- भविष्य किसी अन्य वस्तु की भांति महत्वपूर्ण है, पर इसे कमाना पड़ता है। बिना कमाए हमारा कोई भविष्य नहीं, क्योंकि तब हम इसके काबिल नहीं हैं। हम वर्तमान में जीते है कमोबेश हमेशा। कभी-कभी भूतकाल में भी दुर्भाग्यवश शायद यही प्यार है।’

'शांताराम' का नायक लिन शर्म, अपमान, अपराधबोध और पश्चाताप के चश्मे से मुंबई को खोजता है। वह एक इज्जतदार इंसान था, एक योद्धा। उसने छोटे-मोटे अपराध करने शुरू कर उसने अपने हृदय में बैठे इंसान को नष्ट कर दिया। 'शांताराम' में एक परंपरागत किस्सागोई नहीं, वहां एक बांधा गया कथोप कथन भी नहीं। पात्र आते हैं, चले जाते हैं। हिंदू भी, मुसलमान भी, मंदिर भी, मस्जिद भी, आस्था भी, विश्वास भी। घटनाओं के नाटक में धर्म और कर्मकांड रचा-बसा है।

उपन्यास अचानक शुरू हो जाता है, आपको सहलाकर, पुचकारकर, थप-थपाकर। लेखक ने अपने पात्रों को योद्धा की संज्ञा दी है। हथियार उनका धर्म है। चले या न चले, पर वह उनके पास होना चाहिए। क्या पता कब जरूरत पड़ जाए? 'शांताराम' में पात्र  जेल आते-जाते हैं ससुराल की तरह। उन्हें न कानून से डर है, न पुलिस से। वे अपने जीवन को नियति मानते हैं। जीते हैं, भागते हैं और मर जाते हैं। उनके पास न सपने हैं, न भविष्य के डर।

'शांताराम' मुंबई महानगर की कहानी नहीं है। यह राजमार्गों की नहीं, सड़कों की गलियों की गाथा है, जहां अपराध पैदा होता है एक दर्शन की तरह। इसमें बदनाम बस्तियां हैं, नामचीन गुंडे हैं, भाई हैं। चाकू-छुरी और तमंचे ऐसे चलते हैं, जैसे खिलौने। इंसान की जिंदगी की कोई कीमत नहीं। जब उपन्यास खत्म होता है, तो पाठक सुन्न रह जाता है। उसकी सोचने-समझने की ताकत खत्म हो जाती है। वह पूछता है क्या ऐसा हो सकता है? पुलिस की भूमिका एक मशीन की तरह है। वह अपना काम करती है, पर न अपराध कम होते हैं न अपराधी। और मीडिया एक बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना दिखता है, लिखता है और रोमांचित होता है। खुद अपने लिखे पर जैसे ईसा लिखे, मुसा बांचे।
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