गर्मी के महीनों में नक्सली ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि मानसून के विपरीत यह मौसम उन्हें जंगलों में निर्बाध घूमने की इजाजत देता है। कहा यह जा रहा है कि जिन नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा को निशाना बनाया, वे आंध्र प्रदेश एवं ओडिशा के नक्सल विद्रोही थे, राज्य में अर्द्धसैनिक बलों एवं पुलिसकर्मियों से मोर्चा लेने वाले नक्सली नहीं।
इससे साबित होता है कि माओवादियों की पैठ देश के पूरे हृदय-प्रदेश में है और उनका लाल गलियारा पशुपति (नेपाल) से लेकर तिरुपति (दक्षिण भारत) तक फैला हुआ है।
अपने चरम पर माओवादी विद्रोह देश के 200 से ज्यादा जिलों में दिखाई दे रहा था, पर गहराई से देखें, तो मध्य भारत के केवल 33 जिले ही इससे गंभीर रूप से प्रभावित हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री के लिए यह काफी गंभीर मसला था, जिन्होंने कई मौकों पर कहा कि माओवादी विद्रोह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है।
भले ही उच्च तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन मानव रहित वायुयान घने जंगलों में उन माओवादियों की गतिविधियों का पता लगाने में अब तक विफल रहे हैं, जो पड़ोसी राज्यों से छोटे समूहों में विभिन्न रास्तों से इलाके में पहुंचे थे, ताकि किसी को उनके बारे में पता न लगे।
वह हमला दोपहर में किया गया था, ताकि विद्रोही रात में अंधेरे का फायदा उठाकर भाग सकें। काफिले के साथ चल रहे राज्य पुलिसकर्मियों के पास पिस्तौल एवं मामूली हथियार थे, जबकि विद्रोहियों के पास एसॉल्ट राइफलें थीं। नक्सलियों ने गुरिल्ला हमले के लिए उस जगह का चयन यह सोचकर किया, ताकि अर्द्धसैनिक बल एवं राज्य पुलिसकर्मी समय पर बचाव के लिए न पहुंच सकें।
जाहिर है, नक्सली विशुद्ध सैन्य तरीके से जानते हैं कि उन्हें क्या करना है। क्या हमारी पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों को यह पता है कि विद्रोहियों से कैसे लड़ना है या हम उनसे कुछ ज्यादा ही अपेक्षा कर रहे हैं?
इस हमले को ही लीजिए। छत्तीसगढ़ में अव्वल दर्जे का एक पुलिस प्रशिक्षण संस्थान है, जहां विद्रोहियों से मुकाबले के कौशल और दुर्गम जंगलों में लड़ने के तरीकों के बारे में सिखाया जाता है। इस संस्थान से तीस हजार से भी अधिक पुलिसकर्मी प्रशिक्षित होकर निकले हैं।
25 मई के माओवादी हमले में दस प्रशिक्षित पुलिसकर्मी भी मारे गए। वे मुकाबला इसलिए नहीं कर पाए, क्योंकि नेताओं के उस काफिले में सुरक्षा के मानकों का उल्लंघन किया गया। कांग्रेस के सभी शीर्ष नेता 25 वाहनों के काफिले में एक साथ चल रहे थे। मानो यही काफी न हो, वे जिस रास्ते से गए थे, उसी रास्ते से लौट रहे थे।
कायदे से इस तरह के काफिले के गुजरने से एक घंटा पहले सड़कों की सघन जांच का काम होता है, लेकिन इस मामले में लगता है कि यह काम तीन-चार घंटे पहले ही निपटा दिया गया था। बमुश्किल 15 मीटर की दूरी तक मार कर सकने वाली सुरक्षा बल की पिस्तौलों का नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों से कोई मुकाबला ही नहीं था, जो 500 मीटर तक मार करने में सक्षम थे।
सुरक्षा के मोर्चे पर ऐसी अक्षम्य लापरवाही को देखते हुए ही गृह सचिव आर के सिंह ने सेना के राष्ट्रीय राइफल यूनिट से तीस हजार जवानों एवं वायुसेना के हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल की इजाजत मांगी है। पर सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह नक्सलियों के खिलाफ त्वरित समाधान के पक्ष में नहीं हैं।
नक्सल समस्या के समाधान के लिए वह जंगलों में फौज की टुकड़ियों को नहीं झोंकना चाहते। लेकिन पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में उग्रवादियों एवं आतंकवादियों से मुकाबला करने को अगर पैमाना मानें, तो नक्सल समस्या के समाधान में एक दशक या उससे भी अधिक लग सकता है।
गृह सचिव नक्सलियों के खिलाफ हवाई हमलों के समर्थक हैं; हालांकि वैसा नहीं, जैसा अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ या श्रीलंका की सेना ने लिट्टे के विरुद्ध किया। जबकि सेना माओवादियों से मुकाबले की दीर्घावधि योजना की पक्षधर है। राजनीति से संचालित पुलिस में भी नक्सलियों के खिलाफ सीधे मुठभेड़ पर मतभेद है।
पिछले करीब तीन वर्षों में नक्सलियों के खिलाफ कारगर योजना नहीं बन पाई, तो इसकी वजह यह असहमति भी है। अप्रैल, 2010 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिए थे कि वे भारत के खिलाफ अपनी लड़ाई को व्यापक पैमाने पर ले जाना चाहते हैं।
उस हमले के बाद यह उम्मीद जगी थी कि अब भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान अपनी नींद से जागेगा, पर इस दौरान सीआरपीएफ बटालियनों की संख्या में वृद्धि एवं कुछ हथियारों की खरीद के अलावा जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि 2010 में केंद्र सरकार ने वामपंथी चरमपंथ से प्रभावित नौ राज्यों में विकास कार्यों के लिए एकीकृत कार्ययोजना बनाई थी, लेकिन वह विफल रही, क्योंकि माओवादी वर्चस्व वाले इलाके में विकास संभव नहीं है।
वस्तुतः माओवादियों का रवैया अब बर्दाश्त के बाहर है। सुकमा हमले से पहले उन्होंने झारखंड के लातेहार में सीआरपीएफ जवानों के शरीर में बम लगा दिया था। सुकमा में ही वायुसेना के एक हेलीकॉप्टर को भी उन्होंने मार गिराया था। ऐसे में उनके खिलाफ हवाई हमले का इस्तेमाल न करने की वजह समझ में नहीं आती। नक्सलियों के खिलाफ लंबी रणनीति का बेशक महत्व है, पर उनकी खतरनाक मंशा को देखते हुए तात्कालिक स्तर पर भी कुछ कदम उठाने की जरूरत है।