सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम के केरल के राज्यपाल के रूप में शपथ ग्रहण करने के मामले ने चाय की प्याली में बवंडर को जन्म दे दिया है। स्वयं न्यायमूर्ति सदाशिवम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह पद उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी अमित शाह को कानून के शिकंजे से राहत या रिहाई दिलाने वाले किसी ‘उपकार’ का प्रतिदान नहीं है। इसके बावजूद अनेक विधिवेत्ताओं और अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों ने सदाशिवम के इस फैसले को परंपरा का उल्लंघन बताया है, तो यह गलत नहीं है। चौतरफा नाउम्मीदी के बीच न्यायपालिका की साख बची ही इसलिए है कि वह न्याय और पारदर्शिता को सर्वोपरि महत्व देती है। इसलिए यह ठीक ही कहा जा रहा है कि न्यायमूर्ति सदाशिवम अगर राजभवन निवासी बनने से बचते, तो न्यायपालिका की गरिमा और महिमा अक्षत रहती।
बेशक हमारे संविधान में ऐसा प्रावधान नहीं, जो अवकाशप्राप्त न्यायाधीश को पदभार से मुक्त होने के बाद किसी दूसरे पद को स्वीकारने या राजनीति में भाग लेने-चुनाव लड़ने आदि से वर्जित करती हो। पर आम तौर पर यही माना जाता है कि न्यायपीठ से हटने के बाद कहीं और नजर रखने वाला इंसान इंसाफ के तराजू को इधर-उधर झुका भी सकता है। यह बात सर्वोच्च न्यायालय के जजों पर सबसे ज्यादा लागू होती है। संविधान की व्याख्या, राज्यों के बीच विवाद का निपटारा और विधायिका द्वारा असांविधानिक कानूनों को निरस्त करने का एकाधिकार उनका है। दलगत पक्षधरता या ताकतवर व्यक्ति के स्वार्थ के साथ लेशमात्र भी लगाव या इसका संदेह मात्र आम नागरिक की नजर में उन्हें ‘संदिग्ध’ बना सकता है। इसलिए उच्चतर न्यायपालिका से जुड़े न्यायमूर्तियों को तो ऐसे प्रलोभनों से बचना ही चाहिए।
यह कुतर्क ही है कि अतीत में कई अवकाशप्राप्त न्यायमूर्तियों ने मंत्री पद स्वीकार किया है। बंबई उच्च न्यायालय के एम सी छागला का नाम इस संदर्भ में खासकर याद आता है, जिन्हें नेहरू युग के अंतिम दौर में इसके लिए तैयार किया जा सका था। एक पूर्व जज द्वारा राष्ट्रपति पद के चुनाव में भाग लेना भी इसी कारण विवादास्पद रहा है। पर दशकों पुरानी परंपरा और प्रथाओं का जिक्र आज बेमानी है। भारत में न्यायपालिका का स्वरूप और संस्कार तेजी से बदले हैं। विधायिका और कार्यपालिका से उसका जितना टकराव आज है, उतना पहले नहीं था। नई सरकार द्वारा भी सर्वोच्च न्यायालय के लिए गोपाल सुब्रह्मण्यम का नाम खारिज किया जाना और उससे पहले एकाधिक एडवोकेट जनरल और सॉलीसिटर जनरल की नियुक्ति या इस्तीफा जायज आशंकाओं को बल देते रहे हैं। कॉलेजियम व्यवस्था से निजात पाने के लिए संसद छटपटाती रही है।
भले ही भारतीय संविधान में सत्ता का वैसा स्पष्ट विभाजन नहीं, जैसा अमेरिकी संविधान में है, पर जनतंत्र को निरापद रखने के लिए न्यायपालिका की आजादी अनिवार्य है। कार्यपालिका या विधायिका का मुंह जोहने वाले न्यायमूर्तियों से यह अपेक्षा व्यर्थ है कि वे ‘कानून के सामने सबकी समानता’ वाली व्यवस्था का कवच बन सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने हाल में आहत मन से टिप्पणी की थी कि आखिर न्यायपालिका में भी इसी समाज से लोग पहुंचते हैं- वकील हों या जज। उनके मूल्य और संस्कार आदर्श-निराले और दूसरों से अलग कैसे हो सकते हैं? माननीय न्यायमूर्ति का दुख समझा जा सकता है, पर इस ‘फैसले’ को कुबूलना कठिन है। सेना में स्वेच्छा से भर्ती होने वाले से जिस तरह के अनुशासन-आचरण की अपेक्षा की जाती है, वह असाधारण ही होता है। इसी तरह न्याय जगत को अपना पेशा बनाने वाले से भी असाधारण निष्पक्षता और निःस्वार्थ आचरण की अपेक्षा रहती है।
यह दलील पचती नहीं कि उच्चतर न्यायपालिका के सदस्य अभावग्रस्त जीवन-यापन करते हैं या प्रतिष्ठा के लिए तरसते रहते हैं। अपने देश में अदालत की अवमानना के कानून बेहद सख्त हैं। बड़े राजनेता हों या आला अफसर-कठघरे में खड़े होते हुए सबकी हालत एक जैसी होती है। अलबत्ता यह सुझाव कई बार दिया जा चुका है कि अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों को जीवनपर्यंत वैसी ही पेंशन राशि, घर और अन्य सुविधाएं सुलभ कराई जानी चाहिए, जैसी उनके कार्यकाल में निर्धारित होती हैं, और वैसा ही राजकीय सम्मान भी। इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि किसी भी समय सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त जजों की संख्या बहुत अधिक नहीं हो सकती।
एक बात और याद रखने लायक है। आजकल अनेक ऐसे वैधानिक पद हैं, जो सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के लिए आरक्षित हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पद इनमें एक है। प्रेस आयोग का जिक्र भी जरूरी है। इनके अतिरिक्त अनेक जांच आयोग तथा अंतरराष्ट्रीय पंचाट के अवसरों पर उनके ज्ञान-अनुभव का लाभ राष्ट्र उठाता है-जाहिर है, यह सब अवैतनिक या बिना सुविधा के नहीं होता। एकाध ही अपवाद याद आता है, जब इस तरह के सम्मानित विकल्प से किसी को वंचित रखा गया हो। ऐसा तभी हुआ है, जब अपने कार्यकाल में ही किसी ने प्रथम दृष्ट्या गंभीर आशंकाओं को जन्म दिया हो। हितों के टकराव का रत्ती भर संकेत मिलते ही अपने को किसी मुकदमे से अलग करना ही न्यायपालिका की परंपरा-लोकसम्मत प्रथा है।
चिंतनीय यह है कि ऐसे किसी भी पद पर, जो सरकारी नामजदगी पर निर्भर हो, रिटायर होते ही जा बैठने की उतावली शोभनीय नहीं समझी जा सकती। पर राज्यपाल का पद स्वीकार करते हुए उन्होंने यह कहने की जरूरत समझी कि अरे! अब तक तो मुझे रिटायर हुए चार महीने बीत चुके हैं। मेरी इच्छा तो बस केरल के लोगों की सेवा करने की है। यह जग जाहिर है कि अवकाश ग्रहण करने के बाद जनसेवा के लिए राज्यपाल के रूप में नियुक्ति गैरजरूरी है।
(जेएनयू में प्रोफेसर और कूटनीतिक मामलों के जानकार)