नरेंद्र मोदी सरकार ने अपना काम संभाल लिया है, मगर चुनाव के तुरंत बाद एग्जिट पोल में भाजपा की अगुवाई में राजग सरकार बनने की मजबूत संभावनाएं जताई गई थीं, तभी मुंबई शेयर बाजार में जबर्दस्त तेजी के साथ ही निवेशकों के अच्छे दिन की शुरुआत हो गई थी। मोदी सरकार पर अब आर्थिक मोर्चे पर चमत्कारिक परिणाम देने का जिम्मा है। पांच फीसदी से नीचे की आर्थिक विकास दर को पटरी पर लाना, दहाई के करीब चल रही महंगाई पर काबू पाना, संगठित क्षेत्र में रोजगार अवसरों की लगभग थम गई गति को तेज करना और राजकोषीय मोर्चे पर हालात दुरुस्त करने के साथ कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार को नए सिरे से प्राथमिकताएं तय करनी होंगी।
सरकार की पहली परीक्षा महंगाई के मोर्चे पर होगी। यूपीए गठबंधन की सरकार की सबसे कमजोर कड़ी महंगाई पर काबू नहीं पाना साबित हुई थी। महंगाई के जो ताजा आंकड़े आए हैं, उनमें अप्रैल माह में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) में मामूली सुधार हुआ है, पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) अब भी दहाई के करीब है। आम आदमी को इसी से लेना-देना होता है, क्योंकि महंगाई की सही तसवीर इसी से पेश होती है। इसमें भी सबसे अधिक कीमतें खाद्य उत्पादों की बढ़ रही है। अल नीनो के प्रभाव के चलते मानसून के सामान्य नहीं रहने की आशंका बन गई है, जिसके चलते खाद्य कीमतों पर दबाव बन सकता है। हालांकि रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन और केंद्रीय पूल में रिकॉर्ड भंडार के बेहतर प्रबंधन से सरकार इस मोर्चे पर राहत दे सकती है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है, औद्योगिक उत्पादन का। पिछले वित्त वर्ष में (2013-14) औद्योगिक उत्पादन ऋणात्मक रहा है और करीब दो दशक से ज्यादा में पहली बार यह ऋणात्मक रहा है। हालांकि पिछली सरकार ने राष्ट्रीय मैन्यूफैक्चरिंग नीति (एनएमपी) की घोषणा की थी और इसे जीडीपी के 25 फीसदी पर लाने की बात कही थी, लेकिन इस मोर्चे पर नीतियों की कमियों के चलते बहुत काम नहीं हुआ। नया निवेश नहीं हुआ और नई उत्पादन क्षमता भी नहीं जुड़ रही है। रोजगार के मोर्चे पर अगर हालात सुधारने हैं, तो मैन्यूफैक्चरिंग को रफ्तार देनी होगी। इसके लिए बिजली, सड़क, रेल और बंदरगाह जैसी ढांचागत सुविधाओं में तेजी से सुधार करना होगा। कमजोर ढांचागत सुविधाओं के चलते हमारे देश में सस्ते श्रम के बावजूद उत्पादन लागत बढ़ जाती है और वैश्विक स्तर पर भारतीय उत्पादन की प्रतिस्पर्धी क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
औद्योगिक उत्पादन की कमजोर दर के लिए उद्योग जगत पिछले कुछ समय से ऊंची ब्याज दरों को बड़ी बाधा बताता रहा है। ऐसे में अब नई सरकार के सामने एक अहम मुद्दा ब्याज दरों में कटौती का भी है। आम आदमी भी ईएमआई में कमी के लिए ब्याज दरों में कमी चाहता है। उद्योग का कहना है कि ब्याज दरों में मामूली कमी होने से ही माहौल सकरात्मक हो जाता है और मांग बढ़ती है, जिससे उद्योग की रफ्तार बढ़ती है।
पिछले वित्त वर्ष के लिए जारी अनुमानों में जीडीपी की विकास दर 4.9 फीसदी रखी गई है। वहीं चालू वर्ष के लिए तमाम एजेंसियां इसे छह फीसदी से नीचे ही रख रही है। इसलिए अगर इस मोर्चे पर सरकार को कुछ बेहतर परिणाम दिखाने हैं, तो निवेश बढ़ाने के लिए कदम उठाने होंगे। यहां गुजरात मॉडल को देश भर में लागू करने की क्षमता की परीक्षा होगी। दुनिया के 185 देशों में भारत बिजनेस शुरू करने के लिए अनुकूल माहौल की रेंकिंग में 134वें स्थान पर है और ब्रिक देशों में सबसे निचले स्तर पर है। वहीं गुजरात में इस मोर्चे पर बेहतर स्थिति बताई जाती है। नरेंद्र मोदी की सरकार से इस मोर्चे पर सुधार की उम्मीद उद्योग जगत को सबसे ज्यादा होगी।