पता नहीं क्यों, इन दिनों मुझे अपनी नानी याद आ रही है। भय-वश नहीं, परिस्थितिवश। अक्षर-ज्ञानी नानी राजी-खुशी वाली चिट्ठियां लिख लेती थीं। एक बार ‘ऊं’ से शुरुआत कर अत्रम् कुशलं च तत्रास्तु का पढ़ाया पाठ लिखने के बाद आगे समाचार यह है कि ‘तुम्हारे छोटे नाना नहीं रहे’ लिखकर अपनी अबोधता भी जाहिर की उन्होंने। तब भगवान का भय पैदा करने वाले लिखित पोस्टकार्ड भी चलन में थे, जिनकी स्तुति से अनेक लाभ मिलने के साथ यह धमकी रहती कि यदि इसको ‘फॉरवर्ड’ नहीं किया, तो अनिष्ट अवश्यंभावी है।
नानी का पोस्टकार्डी युग उनके साथ ही दिवंगत हो चुका। यह मोबाइल युग है। फोकट में गपशप के लिए अब फोन में ‘वाट्स एप’ विराजमान। किसने भेजा, यह तो मालूम, लेकिन क्यों भेजा, यह भेजने वाला भी नहीं जानता। उसे फॉरवर्ड करना था, कर दिया। देशज भाषा में ‘ठेलना' था, ठेल दिया। पोस्टकार्ड के पैसे लगते थे। टच स्क्रीन वाले यंत्र में दियासलाई की तीली माफिक उंगली घिसो, आग फैल जाएगी अवांछित सूचनाओं की। निःशुल्क है, तो काहे का गतिरोध। निरंतरता का मूल मंत्र ही है ठेलना। क्या कुछ नहीं ‘फॉरवर्ड’ हो रहा है-गुड मॉर्निंग से श्रीगणेश, कृष्णावतारी उपदेश, बासी चुटकुले, निरर्थक बातों का ब्रेकफास्ट, शर्मनाक लतीफे, दर्दनाक तस्वीरें। गुडनाइट होते-होते परिक्रमा के बाद सब कुछ ‘इनबाक्स’ में।
प्राचीन परंपरा का आविर्भाव है यह फॉरवर्ड शैली। हमारे पूर्वजों में एक राजा थे-भर्तृहरि। बाबा गोरखनाथ ने उन्हें अमृतफल ‘फॉरवर्ड’ किया, जिसे श्रीमंत ने रानी को पास ऑन कर दिया। रानी साहिबा ने फल अपने बॉयफ्रेंड को ‘ठेल’ दिया। बेचारा फल भटकते-भटकते अंततः टेक्निकल जुबान में राजा के ‘इनबाक्स’ में। उसकी विशेषता जानते हुए भी किसी प्रमादी ने ‘सर्च’ नहीं किया कि आखिर फल में कितना सत्यांश था। यह कथा प्रमाणित करती है कि संदेशों के ‘अमरत्व’ की फॉरवर्डिंग परंपरा भारत की देन है। जब तक इस ‘गोरखधंधे’ पर शुल्क नहीं लगता, कैरी आन फ्रेंड्स...।