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तेरी डिग्री ने बड़ा दुख दीना

शरद उपाध्याय Updated Wed, 10 Jun 2015 08:04 PM IST
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हे फर्जी डिग्रीधारी, तुझे शत-शत प्रणाम। तुम्हारे पद और पैकेज को सुनकर मैं कुंठित-सा हो गया हूं। एक फर्जी डिग्री के सहारे तुम कहां से कहां पहुंच गए, और मैं अनगिनत विषयों में सत्यापित डिग्रीधारी एक साधारण पद के लिए तरस रहा हूं। तुम्हारी विलक्षण प्रतिभा मुझे चकित कर देती है। सरकार ने तुम फर्जी डिग्रीधारी के अंतर्मन में छिपे ज्ञान को समझा और तुम्हें असाधारण पद से सुशोभित कर दिया। जबकि इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियों के बाद भी सरकार की कृपादृष्टि मुझ तक नहीं पहुंची।
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अब कभी-कभी मुझे तुम पर तरस भी आता है। पता नहीं, तुम डिग्री के प्रति इतनी आसक्ति क्यों रखने लगे? तुम्हें डिग्री की भला जरूरत कहां है? तुम्हारी जोड़-तोड़ और नाना प्रकार के समीकरण वाली असाधारण प्रतिभा के आगे दुनिया की सभी डिग्रियां फीकी हैं। भारतीय राजनीति उन भौतिकवादी डिग्रियों को क्षणभंगुर मानती ही है। ऑक्सफोर्ड से लेकर आईआईएम की डिग्रियां तक उसकी नजर में मिट्टी के समान हैं। यहां आदमी खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है, कौन-सा डिग्री साथ लेकर जाता है?

तुम बिना डिग्री के भी रहते, तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। सत्ता तक पहुंचने की तुम्हारी असाधारण प्रतिभा के बाद तो तुम्हें पद मिलना ही था। ऐसे में, इस मृगतृष्णा वाली डिग्री के प्रति तुम्हारा मन भला क्यों आकर्षित हो गया? किसी भी मंत्री पद के लिए डिग्री की आवश्यकता आदिकाल से ही नहीं पड़ी है, तो फिर अब क्या पड़ती! इसलिए तुमने डिग्री जुटाकर बेकार ही पीड़ा भोगी।
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तुम्हारी डिग्री ने बड़ा दुख दीना। पर तुम चिंता मत करना। थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा। एक दिन तुम अपनी कुंडली के अनुसार राजयोग धारण करोगे, और सत्ता रहने तक सतत रूप से भव्य जीवन का उपभोग करोगे। बस अपने बारे में क्या कहूं? भारतीय राजनीति के नैतिक मूल्य पर पीएचडी कर रहा हूं। ग्रंथ का विमोचन तुम्हारे कर-कमलों से ही करवाऊंगा। बस इतना अनुरोध है कि दयावश मेरे जैसे अनेकानेक डिग्रीधारियों को कोई छोटी-सी नौकरी दिलवा दो।
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